ब्यूरो दारा सिंह आर्य
आलेख- जगदीश मालवीय आगर
आगर-मालवा जिले के विकासखण्ड कानड़ मुख्यालय के नलखेड़ा रोड पर
स्थित माँ हिंगलाज देवी मठ जिले की धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण केन्द्र है। नगर के मध्य में स्थित यह मठ लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है और *इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।*
इतिहास एवं पौराणिक प्रसंग
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्माण्ड में भ्रमण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र से माता के शरीर के 51 भाग पृथ्वी पर गिरे थे। जहाँ-जहाँ यह भाग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि इस क्रम में माता का ब्रह्मरंध्र पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी के समीप गिरा था, जहाँ विश्व प्रसिद्ध प्रथम हिंगलाज माता शक्तिपीठ स्थित है। उसी आद्य शक्तिपीठ की परम्परा से जुड़ा द्वितीय मठ मध्यप्रदेश के *आगर-मालवा जिले के कानड़ नगर में स्थित है।* यही तथ्य इस मठ की प्राचीनता एवं विश्व प्रसिद्धि का प्रमाण है।
पुरातात्विक महत्व एवं किंवदंती
कानड़ का हिंगलाज देवी मठ पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत प्राचीन माना जाता है। मठ के गर्भगृह में विराजित माँ हिंगलाज देवी की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार मठ का निर्माण सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ था। मठ परिसर में स्थित कई प्राचीन समाधियाँ यहाँ दीर्घकाल से चली आ रही साधु-संत परम्परा एवं तपस्या की साक्षी हैं। मठ की संरचना भले ही वर्तमान में चद्दर की छत्रछाया में है। तथापि इसकी नींव एवं पूजा परम्परा मालवा की प्राचीन मठ संस्कृति से जुड़ी हुई है।
*किंवदंती है कि इस स्थान पर सिद्ध साधकों द्वारा तंत्र साधना की जाती थी* और माता ने स्वयं प्रकट होकर इस स्थान को सिद्धपीठ के रूप में प्रतिष्ठित किया है ऐसी जनश्रुति और मान्यता है।
जन आस्था एवं मान्यता
माँ हिंगलाज देवी मठ के प्रति जन-आस्था अत्यंत गहरी है। इसे नगर की रक्षिका एवं मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य पूर्ण होती है। जिस प्रकार माँ *पीतांबरा पीठ नलखेड़ा की माँ बगलामुखी का प्रथम मंदिर नेपाल, द्वितीय दतिया और तृतीय नलखेड़ा में स्थित होने की मान्यता है, उसी प्रकार हिंगलाज माता के दो प्रमुख मठों में एक बलूचिस्तान और दूसरा कानड़ में होना इसे विशिष्ट बनाता है।* नगर में किसी भी शुभ कार्य से पूर्व माता के दर्शन की परम्परा है।
पूजा परम्परा एवं विशेष अनुष्ठान
मठ में तंत्र साधना एवं गायत्री पाठ का विशेष महत्व है। नवरात्रि पर्व पर यहाँ विशेष पूजा परम्परा का निर्वहन किया जाता है। मठ के पुजारी प. श्री आशीष चतुर्वेदी के अनुसार वर्षों पुरानी परम्परा के अनुसार शारदीय नवरात्रि में अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को माँ की अखंड ज्योत प्रज्वलित की जाती है।
नौ दिनों तक मठ के अंदर हवन-पूजन, दुर्गा सप्तशती एवं सरस्वती पाठ, गायत्री मंत्र जाप तथा तंत्रोक्त साधना की जाती है। शारदीय नवरात्रि में प्रतिदिन सायंकालीन आरती के पश्चात बालिकाओं द्वारा गरबा की प्रस्तुति देकर माँ की आराधना की जाती है। नौ दिनों तक माँ हिंगलाज देवी का अलग-अलग स्वरूपों में विशेष श्रृंगार किया जाता है। सामान्य दिनों में भी प्रातः एवं सायं आरती एवं भोग की परम्परा नियमित रूप से जारी है।
नवरात्रि के दौरान कानड़ नगर सहित आगर-मालवा, शाजापुर, राजगढ़, उज्जैन एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन हेतु पहुँचते हैं।
विशेष उल्लेखनीय तथ्य
*यह मठ विश्व प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में सम्मिलित माना जाता है। बताया* जाता है कि मठ के व्यवस्थापक कलेक्टर, आगर-मालवा हैं।
पुजारी श्री आचार्य ने बताया कि होलकर स्टेट द्वारा मठ के नाम से नगर सहित आसपास के पाँच गाँवों में भूमि दी गई थी जिसका विवरण अभिलेखों में है।
मंदिर के पुजारी श्री आशीष आचार्य ने बताया कि वर्तमान में मंदिर मठ में विराजमान माता चद्दर की छत्रछाया में है। और वर्तमान में स्थायी मंदिर निर्माण एवं संरक्षण की आवश्यकता है।
मठ परिसर तंत्र साधना,
गायत्री उपासना एवं शाक्त परम्परा के साधकों के लिए विशेष साधना स्थल के रूप में मान्य है।
यह प्राचीन मठ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मालवा की लोक आस्था, संस्कृति एवं इतिहास का जीवंत प्रतीक है।
कानड़ के श्री हिंगलाज माता मठ शक्तिपीठ के पुजारी पंडित आशीष आचार्य एवं श्रद्धालुओं का कहना है कि यदि इस मंदिर की जमीन अतिक्रमण मुक्त करवाकर उससे होने वाली आय को
मठ के विकास, भव्य निर्माण जन सुविधाओं के विस्तार के लिए यदि उपयोग किया जाता है। तो इस प्राचीन मठ का भाव एवं विशाल स्वरूप नजर आएगा और यह एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होगा।
जैसा कि श्री हिंगलाज माता मठ कानड़ के के पुजारी पंडित आशीष चतुर्वेदी ने बताया है।
