नलखेड़ा हादसा: चार आदेशों के बीच उलझी जिम्मेदारी, अब सवाल आदेशों के पालन पर

6 जुलाई को जलभराव में आवागमन रोकने की व्यवस्था, 8 जनवरी को मंदिर समिति का प्रभार, 16 सितंबर को प्रशासनिक फेरबदल और हादसे के बाद 19 सितंबर को फिर बदला गया प्रभार

 

नलखेड़ा, आगर-मालवा। मां बगलामुखी मंदिर के समीप 19 सितंबर की रात उफनते बरसाती नाले में कार बहने से आठ लोगों की मौत के बाद अब प्रशासनिक व्यवस्थाओं और जिम्मेदारियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हादसे में ओडिशा के एक परिवार के सात सदस्यों और वाहन चालक की जान गई थी।

हादसे के बाद सामने आए 6 जुलाई, 8 जनवरी, 16 सितंबर और 19 सितंबर के चार प्रशासनिक आदेश पूरे घटनाक्रम की एक ऐसी कड़ी सामने रखते हैं, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था से लेकर मंदिर समिति के प्रभार और प्रशासनिक पदस्थापना तक कई स्तरों पर जिम्मेदारियां तय होती दिखाई देती हैं। अब सवाल यह है कि जिम्मेदारियां तय होने के बावजूद हादसे की रात मौके पर व्यवस्था क्यों नहीं दिखाई दी?

6 जुलाई: जलभराव में रास्ता रोकने की जिम्मेदारी पहले से तय

सबसे पहले 6 जुलाई के आदेश की बात करें। सुसनेर एसडीएम की ओर से जारी व्यवस्था में नदी-नालों में जलभराव की स्थिति में आवागमन रोकने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में कोटवारों की तैनाती की गई थी। संबंधित हल्का पटवारी को इसकी निगरानी और आवश्यक कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई थी।

नलखेड़ा में जिस पुलिया के समीप हादसा हुआ, वहां उपलब्ध आदेश के अनुसार कोटवार कैलाश भिलाला और हल्का पटवारी मुकेश चौहान की स्थानीय स्तर पर भूमिका थी।

यानी बारिश के दौरान जलभराव और आवागमन रोकने की व्यवस्था हादसे से करीब ढाई महीने पहले ही तय की जा चुकी थी। ऐसे में सवाल है कि 19 सितंबर की रात जब नाला उफान पर था, तब क्या इस व्यवस्था के तहत रास्ता बंद किया गया था?

8 जनवरी: मंदिर समिति का समस्त प्रभार कमल मंडलोई को

दूसरा महत्वपूर्ण आदेश 8 जनवरी 2026 का है। इसमें तत्कालीन परि. डिप्टी कलेक्टर कमल मंडलोई को मां बगलामुखी मंदिर समिति का समस्त प्रभार सौंपे जाने का उल्लेख है।

बाद में इसी आदेश में संशोधन करते हुए मंदिर समिति का प्रभार पदेन अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), सुसनेर-नलखेड़ा को सौंपे जाने की व्यवस्था की गई। 19 सितंबर के आदेश में इसी 8 जनवरी के आदेश का संदर्भ देते हुए संशोधन किया गया है।

16 सितंबर: हादसे से तीन दिन पहले बदली कमल मंडलोई की पदस्थापना

इसके बाद 16 सितंबर को प्रशासनिक कार्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ। आदेश में कमल मंडलोई की पदस्थापना कलेक्टर कार्यालय से बदलकर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), अनुभाग आगर-बड़ौद की गई। उनके स्थान पर संयुक्त कलेक्टर मिलिंद ढोके को कलेक्टर कार्यालय में पदस्थ करते हुए कमल मंडलोई के पास रहे शाखा/कार्य का प्रभार सौंपा गया। आदेश तत्काल प्रभावशील था।

लेकिन इस आदेश में मां बगलामुखी मंदिर समिति के प्रभार के संबंध में कोई स्पष्ट संशोधन दिखाई नहीं देता।

यहीं से प्रशासनिक सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब 16 सितंबर को कमल मंडलोई की पदस्थापना बदल दी गई थी, तो मंदिर समिति के प्रभार की स्थिति उसी समय स्पष्ट क्यों नहीं की गई?

19 सितंबर: हादसे के बाद रात 9:22 बजे फिर जारी हुआ आदेश

हादसे के दिन 19 सितंबर की रात 9:22 बजे कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीना के डिजिटल हस्ताक्षर से एक और आदेश जारी हुआ। इसमें 8 जनवरी के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि कमल मंडलोई को मां बगलामुखी मंदिर समिति का समस्त प्रभार दिया गया था। अब उस आदेश में संशोधन करते हुए समिति का समस्त प्रभार पूर्ववत पदेन एसडीओ (राजस्व), सुसनेर-नलखेड़ा को सौंपा जाता है। आदेश तत्काल प्रभावशील किया गया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 19 सितंबर का आदेश 16 सितंबर के आदेश की पुनरावृत्ति नहीं है। यह 8 जनवरी के मंदिर समिति संबंधी आदेश में संशोधन करता है।

लेकिन सवाल फिर भी बना रहता है कि 16 सितंबर को प्रशासनिक पदस्थापना बदलने के बाद मंदिर समिति के प्रभार को स्पष्ट करने के लिए 19 सितंबर तक इंतजार क्यों करना पड़ा?

कागज पर व्यवस्था, मौके पर क्या हुआ?

चारों आदेशों को एक साथ देखने पर घटनाक्रम की तस्वीर कुछ इस तरह बनती है:

6 जुलाई — जलभराव में आवागमन रोकने की स्थानीय व्यवस्था और जिम्मेदारियां तय।
8 जनवरी — मां बगलामुखी मंदिर समिति का प्रशासनिक प्रभार तय।
16 सितंबर — हादसे से तीन दिन पहले कमल मंडलोई की पदस्थापना बदलकर एसडीओ आगर-बड़ौद की गई।
19 सितंबर — हादसे के बाद रात में मंदिर समिति के प्रभार को लेकर 8 जनवरी के आदेश में संशोधन।

अब जांच का सबसे अहम बिंदु यही है कि इन आदेशों के बीच 19 सितंबर की रात जमीन पर क्या व्यवस्था थी और किस अधिकारी-कर्मचारी ने उसकी निगरानी की?

यदि जलभराव के दौरान आवागमन रोकने का आदेश पहले से था, तो यह पता लगाना जरूरी है कि मौके पर रास्ता क्यों नहीं रोका गया। क्या स्थानीय अमले ने आदेश का पालन नहीं किया, क्या वरिष्ठ स्तर से निगरानी में कमी रही या फिर बारिश और अचानक बढ़े जलप्रवाह के कारण परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर हो गईं?

 

जिम्मेदारी तय होगी जांच से

इन दस्तावेजों के आधार पर किसी एक अधिकारी या कर्मचारी को हादसे के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराना अभी उचित नहीं होगा। लेकिन आदेशों के पालन और प्रशासनिक समन्वय की जांच जरूर जरूरी हो गई है।

जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि 6 जुलाई की व्यवस्था के तहत मौके पर किसकी ड्यूटी थी, जलभराव की सूचना किस स्तर तक पहुंची, आवागमन रोकने की कार्रवाई हुई या नहीं, 16 सितंबर के प्रशासनिक फेरबदल के बाद मंदिर समिति की वास्तविक जिम्मेदारी किसके पास थी और 19 सितंबर की रात जारी आदेश की आवश्यकता क्यों पड़ी।

आठ जिंदगियां जाने के बाद अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हादसा कैसे हुआ, बल्कि यह भी है कि जिस खतरे से निपटने की प्रशासनिक व्यवस्था पहले से कागज पर मौजूद थी, वह व्यवस्था हादसे की रात जमीन पर क्यों नहीं दिखाई दी।

यही सवाल अब चारों प्रशासनिक आदेशों को एक साथ रखकर जवाब मांग रहा है।

 

सात साल पहले भी उठ चुका था पुलिया का मुद्दा

 

इसी पुलिया को लेकर 21 सितंबर 2019 को भी मां बगलामुखी भक्त मंडल ने प्रशासन को चेताया था। भक्त मंडल की ओर से तहसीलदार नलखेड़ा को दिए गए पत्र में मां बगलामुखी मंदिर मार्ग स्थित नाले की पुलिया की ऊंचाई बढ़ाने अथवा नाले का गहरीकरण कराने की मांग की गई थी। पत्र में कहा गया था कि थोड़ी बारिश में ही नाले का पानी पुलिया के ऊपर आ जाता है, जिससे मंदिर मार्ग घंटों अवरुद्ध रहता है और श्रद्धालुओं को परेशानी होती है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया था कि नाले के किनारे विद्युत विभाग का ट्रांसफार्मर लगा है और जलस्तर बढ़ने पर पानी उसके पास पहुंचने से करंट फैलने की आशंका बनी रहती है। भक्त मंडल ने पुलिया की ऊंचाई बढ़ाने, नाले का गहरीकरण कराने और ट्रांसफार्मर को अन्य स्थान पर स्थापित करने की मांग को लेकर 22 सितंबर 2019 को मंदिर परिसर में धरना देने की चेतावनी भी दी थी।

यानी जिस पुलिया और नाले की सुरक्षा को लेकर आज से सात साल पहले ही सवाल उठाए जा चुके थे, उसी स्थान पर अब आठ लोगों की जान चली गई। ऐसे में 2019 में उठाई गई मांगों पर क्या कार्रवाई हुई और यदि हुई तो उसका असर मौके पर कितना रहा, यह भी जांच का अहम सवाल बन गया है।

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